वीरता का ध्वज

तब की बात है…

सामने पहाड़ था सिंह की दहाड़ सा,

फिर भी तुम डटे रहे काल सा अड़े रहे,

ध्वज कभी झुका नहीं मान कभी घटा नहीं,

युद्ध की छाप का दुश्मन के विलाप का,

सन्देश मिला देश को और पूरे विदेश को,

जब भी ख़तरा मंडराया ध्वज स्वच्छंद हवा में लहराया,

विवेक से ही काम लिया सूझबूझ का काम किया,

देश का गौरव बना रहा माटी में सौरभ सना रहा,

आश्वस्त है हर देशवासी शंका नहीं मन में ज़रा-सी,

शत्रु-ध्वज उखाड़ दिया दुश्मन को पछाड़ दिया,

अरिहंत तुम कहलाए युद्ध-घाव समय ने सहलाए |

और अब ये हालात है…


लेकिन दुश्मन चालाक है सीमा पर उसकी आँख है,

कुछ भी हो तुम झुकना नहीं घायल हो पर रुकना नहीं,

लेकर वो आएगा हथियार पर देना तुम मुँहतोड़ वार,

शांति-उल्लंघन का करेगा प्रयास संबंधों का होगा ह्रास,

तुम रण-बांकुर सा डटे रहना काल सा अड़े रहना,

विजय सत्य की ही होगी कहाँ जीत पाया कोई ढोंगी,

तुम ही विजय के नायक होगे और प्रशंसा के लायक होगे,

इसलिए “हे देश के वीर सैनिक !” चिंता न करो तनिक,

अपने झंडे का मान करो हर वार को तुम नाकाम करो,

प्रभुता न तिरंगे की झुकने पाए और विकास न कहीं रुकने पाए,

आह्वान करो शौर्य का हर संभव गज ताकि फ़हराता रहे तुम्हारी वीरता का ध्वज |

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