सूरज निकलेगा!

आशा खो गई
निराशा के भंवर मे
जिंदगी चलती रही
खोज मे
ना आदि मे
ना अंत मे
समय के संयोग मे
बेहतरी की आशा मे
जिंदगी की निराशा मे
होने या ना होने के
भंवर मे
कटती जा रही हैं
निराशा बढ़ती जा रही हैं
उम्र घटती जा रही हैं
दुनिया रो रही हैं
पर फिर भी
उम्मीदों को ढ़ो रही हैं
कि
वो दिन फिर आएगा
उम्मीद जवान होगीं
सबका साथ होगा
हाथों मे हाथ होगा
जिंदगी महके गी
रात हटेगी
सूरज निकलेगा..

– राजेश पंत

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