मैं कृष्ण सखी

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”उस बाँसुरी की सम्मोहक ध्वनि सुन कृष्ण सखी कृष्णा के प्राण जैसे उसके पैरों, बदन, हाथों से खिंचकर आँखों के रास्ते निकलकर धीरे-धीरे केशव की ओर बढ़ रहे हैं। ”मानो केशव कह रहे हैं,”आओ सखी। आओ। सभी प्राणी मुझी से जन्म पाते हैं, फिर लौटकर मुझ में ही आ जाते हैं। ”एक दिव्य प्रकाश कृष्णा सखी के चारों ओर फैल रहा है, उसी समय सखी के प्राण केशव के चरणों में विलीन होना चाहते हैं पर केशव उनको अपने हृदय में खींच लेते हैं। तुम्हारा स्थान सदा ही मेरे हृदय में है सखी कृष्णे।”

द्रुपद पुत्री द्रौपदी, पांचाल राज्य की अप्रतिम सौन्दर्य की स्वामिनी, तेज़स्वी, मनीषी, प्रखर बुद्धिमति थी। अपने समय के सबसे वीर पुुरुष अर्जुन को ब्याही, पर उस वीर पुरुष ने माँ की आज्ञा मानकर उसे पाँच पाण्डव भाइयों में बाँट दिया। द्रौपदी ने इसे ही प्रारब्ध मानकर उनकी तन-मन से आयुपर्यन्त सेवा की।

क्रूर दुष्ट कौरवों ने परम शक्तिशाली वीरों की सभा में कुरुवृद्धों की सभा में समस्त मंत्रिगणों के सामने उसका हरण करने का प्रयास किया परन्तु द्रौपदी ने अपने तेज़ से, बुद्धि कौशल से अपनी अस्मिता की रक्षा की।

द्रौपदी तेरह वर्ष तक वन-वन भटकती रही, धूल, $फाँकती रही, दासत्व को स्वीकारा, हारे हुए जुआरी पतियों के साथ छाया की तरह रह जंगल-जंगल की $खाक छानती रही। हाँ! कुरुवंश के संरक्षक भीम ने अवश्य दु:शासन को एक चेतावनी ज़रूर दी, कि दु:शासन तेरे गन्दे हाथों ने द्रौपदी की केशराशि को छुआ है इसलिए मैं तेरी छाती को चीरकर उसके रक्त से केशराशि का प्रक्षालन कर उन्हें पवित्र करूँगा, यह मेरी अटल प्रतिज्ञा है।

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