कर्मजनित भाग्य

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व्याख्याएँ अंतर्मन से आती हैं।

किसी रास्ते में सड़क के किनारे यदि पेड़ हवा से हिलते-डुलते दिखाई दें तो कोई कहता है कि ये वायवीय आंदोलन से व्यथित हैं, कोई कहता है कि ये हर्षातिरेक से गा रहे हैं, यही अंतर्मन है।

रमाकांत पाण्डेय ‘अकेले’ जो कुछ सामने दिख रहा है उसे निमित्त बना कर अपनी बात कह जाते हैं।

अपनी बात अर्थात् अपने अंतर्मन का स्खलन!

कर्म और भाग्य दुनिया शुरू होने के दिन से ही आमने-सामने हैं। इन्हें कोई तो नज़दीक लाए।

रमाकांत पाण्डेय ‘अकेले’ लाते हैं।

मनुष्य ने सब कुछ अपने से जोड़ रखा है। अगर कोई हिरण भाग रहा है तो वो मानव से डर कर भाग रहा है, यदि कोई व्याघ्र आ रहा है तो वो आदमी को खाने आ रहा है। कर्म और भाग्य भी इसी तरह हैं।

हमें न कर्म से पीछे हटना है और न भाग्य से डरना है। यही जीवन है।

यदि आप आज के तेज़-चाल जीवन में भाषा के सौष्ठव के झर जाने से व्यथित हैं तो ‘कर्मजनित भाग्यÓ आपको एक आंतरिक उद्वेग देगी। इसके प्रसंग आपको प्रहसनों की तरह दृष्टव्य झंझावातों में झुला कर काम की बात कहेंगे। आपको रुचेगा।

ये सब अच्छा है।

बीता जीवन तो गया। लेकिन इस पर मलाल करना तो मौजूदा जीवन को भी ले जाएगा। मरे पशुओं से भी तो चर्म, नख, दंत आदि निकाल कर उनके उपयोग तलाशे ही जाते हैं तो हम क्यों न इसी तरह करें। पुरानी बातों को नए संदर्भों में पढ़ें।

रमाकांत जी तो आपको और भी आगे ले जाते हैं। वे आमने-सामने खड़े प्रश्नों को एक ही दिशा में देख रहे सूरजमुखी फूलों में बदल देते हैं।
उनकी भाषा रोचक भी होती है, साफ़ भी।

कहते हैं कि भाषा कठिन या सरल नहीं होती, बल्कि हम ही भाषा से अवगत या अपरिचित होते हैं। पढ़ते ही हमारा पाला बदल जाता है। हम तृप्ति की छांव में आ जाते हैं।
वेदना, व्यथा, उपेक्षा सब तभी तक हैं जब तक हम न पढ़ें। चिंतन-मनन की अगली गली में संतोष का घर है। डर के आगे जीत है।

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