भू सुर

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भू-सुर एक नया सा प्रयोग है, जिसका अर्थ है धरा का देवता।

चिंतनशील विचारक रमाकांत पाण्डेय ‘अकेले’ इस पुस्तक में हमारी आज की सामाजिकता के धुंधले सवालों से गर्द हटाने में तल्लीन दिखाई देते हैं।
यदि हम मानव की कहानी पढ़ें तो आरंभ में कोई जानता ही नहीं था कि जाति या धर्म क्या है। केवल दो जातियाँ थीं—आदमी और औरत!

लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे हमारे मस्तिष्क ने कसरत करना सीखा, हम तरह – तरह से बंटते चले गए। कभी स्थान को लेकर, कभी कार्यों को लेकर, कभी स्वभाव को लेकर, तो कभी आकार-प्रकार को लेकर।

मनुष्यता की अलग-अलग किस्में बना लेना हमें जि़न्दगी बिताने का एक सुगम जरिया नजऱ आने लगा और हम जाति-धर्म आदि में अपने को बाँट कर सत्ता और अधिकार कमाने के लोभी बनते चले गए।

‘भू-सुर’ को पढ़ते हुए आपको पता चलेगा कि हम किस तरह मकड़ी की भाँति अपने ही लिए जाल बुनते चले गए। हम अपने पैदा किए हुए भँवर में फंसते चले गए।
अपनी इस पहचान ने हमारी सोचने-समझने की शक्ति को धीरे-धीरे कूप- मंडूक की मानसिकता में ला दिया। हम अपनी इसी पहचान के लिए मरने-मारने पर उतारू होने लगे।
हमारे देश में एक के बाद एक आते चले गए आक्रामक लुटेरों व आतताईयों ने हमारी इस मानसिक वृत्ति का विदोहन किया और हम इसी के आदी हो गए।
पांडेय जी कहते हैं कि यदि हम प्रकृति को परमेश्वर की इच्छा मान लें तो हम सहस्त्रों तर्क-कुतर्कों से बच जाएँगे।
उनकी ये बात भी सही है कि सरकार और उसका प्रशासन तंत्र जनता को जो स्वरूप देना चाहता है, वह उसे मिल ही जाता है। परिणाम झेलती है जनता, सरकार पर कोई असर नहीं पड़ता।

हम निमित्त चाहे किसी भी एक जाति या धर्म को बना लें, पर कमोबेश स्थिति सभी की एक-सी है। सबके पास अपनी गाथा गाने को अनेकों उदाहरण हैं, सभी के पास अपनी पीठ थपथपाने के बेशुमार मौक़े हैं। क्या उचित, क्या अनुचित, ये परखने का न कोई जरिया बचा है और न किसी की इच्छा। रस में डूबे वृत्तांत आनंद तो देते ही हैं।

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