आत्मबल

यूँ तो समंदर में चलती है हज़ारों किश्तियाँ
मगर हर किश्ती समंदर में डूबती तो नहीं
|डर है गर डूबने का किसी किश्ती को ,
ऐसी किश्ती समंदर में चलती तो नहीं |

चल रही है जैसे किश्तियाँ , आदमी भी चल रहा है,
जीवन के समंदर में आदमी डूबता तो नहीं,
डर है गर डूबने का किसी आदमी को ,
ऐसा आदमी जीवन में चलता तो नहीं

मत बांधों इन्हें किनारे से लगे सहारे से,
किनारा छोड़े बिना कोई पार लगता तो नहीं
निकल पड़ो बिना डर के भरे समंदर में ,
डर के चलने वाला कभी संभलता तो नहीं |

लेकर चलो आत्मबल की पतवार हाथों में ,
आत्मबल से किया फैसला कभी टलता तो नहीं ,
कर लिया फैसला तो पार ज़रूर उतरोगे ,
निडर होकर चलने वाला कभी गिरता तो नहीं |

राकेश ’राही’

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